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सीहोर : आस्था के साथ किया गया श्री कार्तिक शिव महापुराण कथा का समापन पार्वती ने कठिन तपस्या से भगवान शिव को प्राप्त किया-भागवत भूषण पंडित प्रदीप मिश्रा

सीहोर : आस्था के साथ किया गया श्री कार्तिक शिव महापुराण कथा का समापन पार्वती ने कठिन तपस्या से भगवान शिव को प्राप्त किया-भागवत भूषण पंडित प्रदीप मिश्रा

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आस्था के साथ किया गया श्री कार्तिक शिव महापुराण कथा का समापन
पार्वती ने कठिन तपस्या से भगवान शिव को प्राप्त किया-भागवत भूषण पंडित प्रदीप मिश्रा

 

सीहोर। मां पार्वती ने भगवान शंकर को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की। भगवान शंकर ने पार्वती की परीक्षा के लिए सप्तर्षियों को भेजा। सप्तर्षियों ने पार्वती से शंकर के अनेक अवगुणों का वर्णन किया जिससे पार्वती, महादेव से विवाह न करें, लेकिन देवी नहीं मानीं। अब भगवान शंकर ने प्रकट हुए और पार्वती को वरदान दिया। उक्त विचार जिला मुख्यालय के समीपस्थ चितावलिया हेमा स्थित निर्माणाधीन मुरली मनोहर एवं कुबेरेश्वर महादेव मंदिर में जारी श्री कार्तिक शिव महापुराण कथा के अंतिम दिन भागवत भूषण पंडित प्रदीप मिश्रा ने कहे।
उन्होंने कहा कि जब भगवान शंकर माता सती को राम कथा सुना रहे थे, तभी आकाश मार्ग से कई देवता जा रहे थे। सती के पूछने पर भगवान शंकर ने बताया कि दक्ष प्रजापति ने घमंडवश ब्रह्मा, विष्णु व महेश का अपमान करने के लिए अपने घर महायज्ञ का आयोजन किया था। इसमें तीनों देवताओं को नहीं बुलाया गया। सती ने जब वहां जाने की इच्छा जताई तो भगवान शंकर ने बिना बुलाए जाने पर कष्ट का भागी बनने की बात कही। इसके बाद भी सती नहीं मानी और पिता के घर चली गई। यज्ञ में भगवान शंकर, विष्णु व ब्रह्मा का अपमान देखकर हवन कुंड में कूदकर खुद को अग्नि के समर्पित कर दिया। इसके बाद भगवान शंकर के दूतों ने यज्ञ स्थल को तहस-नहस कर दिया। भगवान शंकर भी शोकाकुल होकर समाधि में लीन हो गए। कालांतर में माता सती देवराज हिमालय के घर में पार्वती के रूप में पैदा हुईं। वहां पहुंचे देवर्षि नारद ने हिमालय राज और माता मैनावती के सम्मुख बेटी का भाग्य बताते हुए कहा कि इसे जो वर मिलेगा वह शिव जैसा होगा। माता पार्वती ने भगवान शिव को ही पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या शुरू कर दी। दूसरी ओर भगवान शंकर समाधि में लीन थे। देवी पार्वती का शिव से विवाह कराने के लिए समाधि भंग करना जरूरी था। ऐसे में देवताओं ने कामदेव को भेजा। कामदेव ने ध्यान भंग करने का प्रयास किया तो नाराज भगवान शंकर ने तीसरा नेत्र खोल दिया। जिससे कामदेव वहीं भस्म हो गए। कामदेव की पत्नी रति विलाप करते हुए भगवान शंकर के पास पहुंची। क्षमा याचना के बाद शिव ने कामदेव को द्वापर युग में श्रीकृष्ण के पुत्र के रूप में जन्म लेने का आशीर्वाद दिया था। समाधि टूटने के बाद भगवान विष्णु ने भगवान शंकर से पार्वती को पुन: अंगीकार करने की प्रार्थना की। भगवान शंकर ने सप्तऋषियों को पार्वती की परीक्षा लेने के लिए भेजा। पार्वती ने केवल शिव को ही अपना वर चुनने की बात कही। इसके बाद शिव पार्वती को पुन: अपनाने के लिए राजी हो गए।

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