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सीहोर/आष्टा : नेताजी की जयंती और “पराक्रम दिवस” के मायने

लेखक ब्लॉगर और युवा पत्रकार - सुदर्शन व्यास

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नेताजी की जयंती और “पराक्रम दिवस” के मायने


जब भारत अंग्रेजों की गुलामी से छूटने के लिए संघर्षरत् था, उस दौर में मां भारती के कई लालों ने देश को आज़ाद कराने के लिए हरसंभव कोशिश की। स्वातंत्र्य समर में एक शख्स ने लोगों को ये कहकर भरोसा दिलाया कि “तुम मुझे खून दो – मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा…” राष्ट्रसेवा का महान संकल्प लेकर ये नारा देने वाली वो शख्सियत थी नेताजी सुभाषचन्द्र बोस।
गुलामी की बेड़ियों में जकड़े भारत को आज़ाद कराने में उस दौर के अनेक देशप्रेमियों ने अपने प्राणों का बलिदान तक दे दिया। उन महान हूतात्माओं में से एक सुभाष बाबू ने भारत को आज़ाद कराने के लिए अंग्रेजों की कल्पनाओं से परे रहकर विदेशी धरती पर एक नई सेना तक संगठित कर ली थी। अपने बौद्धिक पराक्रम के बल पर अंग्रेजों की नाक में दम करने वाले नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को उनके जीते जी ब्रिटिश हुकूमत कभी ढूंढ नहीं पाई थी।
असल में इस वर्ष यानि 23 जनवरी 2021 को सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती है। केन्द्र सरकार ने फैसला किया है कि अब से हर वर्ष पूरे देश में आज का दिन पराक्रम दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इससे देश के लोगों विशेषकर युवाओं को विपत्ति का सामना करने में नेताजी के जीवन से प्रेरणा मिलेगी और उनमें देशभक्ति और साहस की भावना समाहित होगी। यकीनन, भारत सरकार का यह कदम स्वागतयोग्य है, हां ये बात और है कि सरकार को यह निर्णय लेने में 70 बरस लग गये।
नेताजी की जन्म जयन्ती पर पराक्रम दिवस के मायने उनके जीवन चरित्र से साफ़ तौर पर झलकते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि अपने जीवनकाल में नेताजी के निर्णय पराक्रमता से ओतप्रोत ही रहे, क्योंकि जिस दौर में अंग्रेज़ों के सामने भारतीयों को दोयम दर्जे का व्यक्ति माना जाता था, ऐसे कठिन समय में नेताजी ने उस समय में सिविल सेवा परीक्षा में अव्वल चौथा स्थान प्राप्त किया था। देश को गुलामी की जंजीरों में जकड़ा देख उन्होंने सिविल सेवा छोड़कर कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की।
जब साल 1939 में सुभाष चन्द्र बोस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए तो गांधी जी ने इसे अपनी व्यक्तिगत हार बताया। महात्मा गांधी के इस बयान के बाद नेताजी ने न सिर्फ अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया, बल्कि कांग्रेस को भी हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था।
इतना ही नहीं, दूसरे विश्व युद्ध की आपदा को बोस ने भारत की स्वतंत्रता के अवसर के रूप में देखा था, उनका मानना था कि दुश्मन यानि अंग्रेजों के दुश्मन को दोस्त बनाकर भारत को स्वतंत्र किया जा सकता है। अंग्रेजों ने जब उन्हें नज़रबंद किया तो वे अपने भतीजे की सहायता से अफगानिस्तान और सोवियत संघ होते हुए जर्मनी पहुंच गये।
उस दौर में साल 1933 से 36 तक यूरोप में रहते हुए उन्होंने हिटलर से भी मुलाकात की। तब जर्मनी वैसे ही इंग्लैण्ड से बदला लेना चाह रहा था, नेताजी का मानना था कि स्वतंत्रता हासिल करने के लिए राजनीतिक गतिविधियों के साथ ही कूटनीतिक और सैन्य सहयोग भी जरूरी है, इसीलिए उन्हें हिटलर और मुसोलिनी में भविष्य का मित्र दिखाई दिया था। जर्मनी के बाद नेताजी ने जापान का रुख किया और इसके बाद सीधे सिंगापुर पहुंचकर भारत से बाहर रह रहे भारतीयों को एकजुट कर अंग्रेजों के खिलाफ उन्हें संगठित करते रहे।
सिंगापुर पहुंचने के बाद नेताजी ने आज़ाद हिंद फौज की कमान अपने हाथों में ली और महिलाओं के लिए रानी झांसी रेजीमेंट का भी गठन किया। ये नेताजी की ओजस्वी क्षवि का ही परिणाम था कि देश को आज़ाद कराने के महनीय अभियान के लिए नेताजी की एक अपील पर विदेश में रह रहे भारतीयों ने बढ़ – चढ़कर न सिर्फ अपनी संपत्ति दान की बल्कि अपने खून का एक – एक कतरा देने के लिए भी किसी ने हिचक तक महसूस नहीं की थी। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जीवन की ये बड़ी घटनाएं हमें बताती है कि उनकी जन्म जयन्ती को पराक्रम दिवस के रुप में मनाने के मायने कितने महत्वपूर्ण हैं। जननायक नेताजी सुभाष बाबू को 125वीं जन्म जयंती पर कोटिश: नमन्।
:- सुदर्शन व्यास (लेखक ब्लॉगर और युवा पत्रकार हैं)

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