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आष्टा : शिक्षा पद्धति को भारत की आत्मा से जोड़ना होगा शिक्षक संगौष्ठी में – मुनि सम्भव सागरजी

अमित मंकोडी

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शिक्षा पद्धति को भारत की आत्मा से जोड़ना होगा

शिक्षक संगौष्ठी में मुनि सम्भव सागरजी ने कहा

भाषाई स्वतन्त्रता के बगैर किसी देश को पूर्ण रूप से स्वतंत्र नही कहा जा सकता। किसी भी भाषा का विरोध नही किया जाना चाहिए पर शिक्षा क्षेत्रीय अथवा मातृभाषा में ही दी जानी चाहिए। व्यक्ति, परिवार, धर्म, समाज और राष्ट्र के विकास में शिक्षा का महत्व है इस उद्देश्य की प्राप्ति स्व भाषा को अपना कर ही की जा सकती है। आज शिक्षा पर बाजारवाद हावी है नैतिक मूल्य शिक्षा से लुप्त हो गए हैं। औपचारिक शिक्षा सिर्फ भीड़ या भेड़चाल की तरह हो गई है। कागजी परिणाम की चाह में तनाव ग्रस्त विद्यार्थी अपनी सांस्तिक जड़ों और गौरवशाली अतीत से कट रहे हैं। भारत मे लार्ड मैकाले की वर्तमान शिक्षा नीति अंग्रेजो के कुचक्र से अधिक कुछ नही। इस पद्धति में चिंतन की बजाय रटने पर विद्यार्थी का जोर रहता है।
भारत मे शिक्षा पद्धति को भारत की आत्मा से जोड़ना होगा तभी हम अपनी संस्ति और गौरवशाली अतीत को बचा सकेंगे। इस आशय के प्रवचन आचार्य विद्यासागर जी महाराज के विद्वान शिष्य मुनि सम्भव सागरजी महाराज ने जैन मंदिर किला के सभागार में शिक्षा और भारतवर्ष’ विषय पर आयोजित संगौष्ठी में मौजूद शिक्षकों को संबोधित करते हए व्यक्त किए। मुनि श्री ने आगे कहा कि हमारे शासन, प्रशासन और न्याय व्यवस्था पर अंग्रेजियत का प्रभाव अभी भी दिखाई देता है। अंग्रेजो की यह नीति थी कि वो गुलाम राष्ट्रों की मूल व्यवस्थाओं को चौपट कर देते थे, गुलामी के यही संस्कार आज भी भारत पर हावी हैं, नई शिक्षा नीति पर अपने विचार रखते हुए मुनि श्री ने कहा कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और कस्तूरी रँगन जैसे अनेक शिक्षाविद ने भारतीय भाषा और संस्ति से लेकर भारत के गौरवशाली इतिहास को बढ़ावा देने के लिए आचार्य श्री विद्या सागरजी महाराज के राष्ट्र के संदर्भ में अनुसंधानित सूत्रों पर भी मनन किया है नई शिक्षा नीति में संस्कार और भाषाई संयोजन का प्रयास किया जाना चाहिए। मुनि श्री ने कहा कि शून्य और दशमलव के आविष्कारक हमारे देश मे आर्यभट्ट, वराहमिहिर, कौटिल्य जैसे अर्थशास्त्री और विश्व के प्रथम शल्य चिकित्साचार्य सुश्रुत जैसे मनीषियों के बारे में विद्यार्थियों को बताना आवश्यक है। उन्होंने उदाहरण दे कर कहा कि यूरोपीय देशों में शिक्षा उनकी मातृभाषा में ही दी जाती है। मुनि श्री ने भाषाई एकता और परस्पर सम्मान पर जोर देते हुए बताया कि आचार्य विद्यासागरजी ने कन्नड़ भाषी होते हुए भी राष्ट्र भाषा हिंदी में मूक माटी सहित कई महाकाव्य का सृजन कर दिया जिस पर कई हिंदी शोधार्थियों ने पी एच डी और एम फील किया है। मूक माटी का अनेक देशी- विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है मध्यप्रदेश शासन ने इसे अपने हिंदी पाठ्यक्रम में भी शामिल किया है । मुनि सम्भव सागरजी ने न्याय ष्टांतों और निर्णयों को भी पक्षकार की भाषा मे ही उपलब्ध कराने की बात करते हुए बताया कि इंदौर में न्यायाधीशों की संगौष्ठी में आचार्य श्री के ऐसे ही सुझाव पर न्यायाधीशों ने अपने फैसले हिंदी में सुनाने का संकल्प लिया था शिक्षकों को भी चाहिए कि वो शिक्षा का सरलीकरण करके उसे प्रभावी बनाएं। इसके पूर्व मुनि निष्पक्ष सागरजी ने भी शिक्षा प्रणाली पर आधारित साहित्य के अध्ययन पर बल देते हुए कार्यक्रम में मौजूद शिक्षकों को उपलब्ध कराए गए उपयोगी साहित्य पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए अनेक लुप्तप्राय ग्रन्थों के पुनर्प्रकाशन के बारे में बताया। मुनि श्री राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों की महनीय भूमिका और प्राचीन गुरुकुल पद्धति को आधुनिक तरीकों से प्रोत्साहित करने को भी जरूरी बताया। कार्यक्रम के आरम्भ में दीप प्रज्ज्वलन एवं आचार्य श्री के चित्र का अनावरण पूर्व नपाध्यक्ष कैलाश परमार, बी. आर सी. अजब सिंह राजपूत, शास्त्री स्कूल के प्राचार्य प्रेम नारायण शर्मा, वरिष्ठ समाजसेवी रामेश्वर खण्डेलवाल, कवि गोविंद शर्मा, दिगम्बर जैन समाज के संरक्षक मनोज पोरवाल, महामंत्री कैलाश चित्रलोक, सांस्तिक मंत्री पंकज अष्टपगा, मुकेश बड़जात्या ने किया। मुनि श्री को शास्त्र भेंट अनिल प्रगति, शिक्षक अजय जैन, संतोष जैन, मनोज जैन, संजय जैन ने किए। श्वेतांबर जैन समाज के अध्यक्ष पारसमल सिंघी, सुनील प्रगति तथा संघ परिवार के सदस्यों ने भी मुनि संघ को श्रीफल अर्पित किए। मंगलाचरण विल्सन जैन ने तथा संचालन वरिष्ठ शिक्षक सुरेन्द्र जैन ने किया।

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