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सीहोर : धर्म ढोंग की वस्तु नहीं, जीवन जीने की कला है- मुनि अजीत सागर महाराज

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कषाय व्यक्ति को दुर्भाग्य के पथ पर ले जाती, धर्म ढोंग की वस्तु नहीं, जीवन जीने की कला है- मुनि अजीत सागर महाराज

आष्टा। भावनाओं का अदभुत प्रभाव रहता है। भावना अच्छी तो प्रभाव भी अच्छा होता है। मैना के पंचकल्याणक प्रतिष्ठा का समय आचार्य श्री ने दिया है। आपकी सद्भावना, विनती का प्रभाव है जो आचार्य श्री ने ग्यारस के पहले पंचकल्याणक कर लेना करने की बात कही। आचार्य श्री बड़ी-बड़ी समाज की ही नहीं छोटे-छोटे समाज के निवेदन को भी गंभीरता से लेते हैं। भावनाओं का प्रभाव आचार्य विद्यासागर महाराज के भाव से जुड़ा है। नए के साथ पुराने भगवान भी नए मंदिर में विराजित होंगे। भावनाएं सभी की होती है, पुण्य सभी के अलग-अलग होते हैं, हम अपने अंदर के पुण्य के भाव अच्छे बनाकर निर्मल बनाएं। विशुद्धि और भक्ति बढ़ाएं, नियम-संयम का ध्यान रखें।

                         उक्त बातें समीपस्थ ग्राम मैना में 24 नवंबर से प्रारंभ होने वाले पंचकल्याणक प्रतिष्ठा समारोह के पात्रों के चयन कार्यक्रम मैं आशीष वचन के दौरान मुनि अजीत सागर महाराज ने कही। संतों के सान्निध्य में समाज के लोगों ने पात्रों के चयन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेकर पुण्य अर्जन किया। मुनिश्री अजीत सागर महाराज ने धर्म सभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा धर्म ढोंग की वस्तु नहीं, सही ढंग से जीने की कला है। अत: धर्म को ढाेंग से नहीं, ढंग से करें। ढोंग से पाखंड पलता है। पाखंड न करें, पाप को क्षय करो। मुनिश्री ने कहा पाप के क्षय के लिए शुद्ध आचरण की आवश्यकता है। मुनि अजीत सागर महाराज ने कहा आंतरिक पवित्रता के अभाव में किए गए बाह्य त्याग को आडंबर बताते हुए कहा मनुष्य वास्तव में अपने मन से तो किसी वस्तु को छोड़ता नहीं। लेकिन बाहर त्याग का आडंबर रचता है। लोगों को ठगता है। उससे बढ़कर कठोर ह्रदय कोई नहीं, जो मनुष्य बाहर से अपनी कर्म इंद्रियों को रोककर मन ही मन इंद्रिय विषयों को स्मरण करते रहता है, वह मूढात्मा और अंतरंग में दोष पूर्ण जीवन शैली बहुत बड़ी आत्म वंचना है। जो आत्मा को चारों ओर से पतन कराने वाली है।

धन को गाड़ना पाषाण बनाने के समान है

मुनिश्री ने कहा जो संपत्ति का संग्रह करके ना तो उसका उपभोग करता है, ना ही सत पात्रों को दान देता है। वह बहुत बड़ी आत्म वंचना करता है। उसका मनुष्यत्व निष्फल है, जो पुरुष परिश्रमपूर्वक धन अर्जित कर उसे धरती के नीचे गाड़ कर रखते हैं। वे अपनी संपत्ति को पाषाण के समान बना रहे हैं। वस्तुत: संपत्ति को गाड़ने की जरुरत नहीं है। अपने पुण्य को गाड़ा बनाने की आवश्यकता है। कोई कितना भी सुरक्षित रखने का प्रयत्न करें, पुण्य के योग के रहने तक ही इनका टिकाव होता है। पुण्य के क्षीण होते ही ये सब नष्ट हो जाते हैं।

भगवान के माता-पिता संतोष कुमार नन्नूमाल जैन बने

मैना के पंचकल्याणक के पात्रों का चयन अजीत सागर महाराज, ऐलक दयासागर महाराज, विवेकानंद सागर महाराज की उपस्थिति में ब्रह्मचारी रविंद्र भैय्या जी कोटा द्वारा कराया गया।जिसमें भगवान के माता-पिता बनने का लाभ संतोष कुमार नन्नूमल जैन ने लिया। , वही सौधर्म इंद्र बनने का लाभ अशोक कुमार ऋषभ कुमार जैन ने ,  कुबेर इंद्र बनने का लाभ वीरेंद्र कुमार संतोष कुमार जैन मैना ने, महायज्ञ नायक बनने का लाभ बाबूलाल, राजकुमार, राजेश कुमार जैन ने, ईसान इंद्र बनने का लाभ मगनलाल ,संजय कुमार, सुनील कुमार जैन, सनत कुमार धुर्वे का लाभ ऋषभ कुमार जैन मैना, महेंद्र इंद्र बनने का लाभ सुहागमल,अभिषेक कुमार जैन मैना, ध्वजारोहण करने के लाभार्थी शीलचंद, सुशील कुमार जैन मैना, राजा श्रेयांश बनने का लाभार्थी राजेश कुमार मयूर कुमार जैन इंजीनियर, भरत भगवान बनने के लाभार्थी उसके बाद सोनू सुशील कुमार संतोष कुमार जैन आदि ने लिया।

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