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आष्टा : समता भाव से कर्म पर विजय प्राप्त करें – अपूर्वमति माताजी

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समता भाव से कर्म पर विजय प्राप्त करें – अपूर्वमति माताजी

आष्टा। मनुष्य को हमेशा समता भाव से कर्म पर विजय प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए, लड़ झगड़ कर नहीं। चेलना ने राजा श्रेणिक से विवाह किया था ,वह काफी धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी। वही राजा श्रेणिक बौद्ध धर्म को पालते थे ,लेकिन चेलना ने मन में ठान ली थी कि जब तक मैं अपने पति को जैन धर्म से नहीं जोड़ दूंगी तब तक चेन नहीं लूंगी और उन्होंने न केवल अपने पति राजा श्रेणिक को जैन धर्म से जोड़ा अपितू तीर्थंकर योनि का बंध भी कराया। जब भी मुनि ,तीर्थंकर एवं जिनवाणी का सानिध्य मिले तो देरी न करें, तत्काल उनकी वाणी को ग्रहण करें। मुनिराज के दर्शन एवं आशीर्वाद से जीवन में काफी परिवर्तन आता है।     

                          उक्त बातें समीपस्थ ग्राम मैना में चल रहे श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के अवसर पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर महाराज की परम प्रभाविका शिष्या आर्यिका रत्न अपूर्वमति माता जी ने कहीं।दिगंबर जैन समाज के प्रवक्ता नरेंद्र गंगवाल ने उक्त जानकारी देते हुए बताया कि अपूर्वमति माताजी ने आगे कहा जीवन में तीन चीजों का पालन करना चाहिए। दिमाग में आईस, जुबान पर शुगर, दिल में लव की फैक्टरी बनाकर मनुष्य अपने जीवन को धन्य बना सकता है। जो जीवन में निष्कपट भाव से गुरु की सेवा करता है उसका जीवन धन्य हो जाता है। गुरु के चरण दबाना जरूरी नहीं है। गुरु भक्ति जीवन में सदैव बनी रहे उसके लिए गुरु के गुणों का विस्तार करना जरूरी है। जिन गुरु के सान्निध्य में उन्नति का मार्ग मिलता है, उसकी महिमा करना ही श्रेष्ठ गुरु भक्ति मानी गई है। बिना गुरु की कृपा के मोक्ष मार्ग भी संभव नहीं होता है। अपूर्वमति माताजी ने कहा कि  मनुष्य शरीर मिलना अत्यंत दुर्लभ, इसके लिए स्वर्ग में बैठे देवता भी याचना करते हैं ,जो आज हमें सुलभ है। मनुष्य तन पूर्व जन्म के पुण्य के फलस्वरूप ही हमें प्राप्त होता है। 

                             उन्होंने कहा कि संसार में रहकर हम शरीर सुख के लिए ही प्रतिपल प्रयासरत रहते हैं जबकि प्राणी का शरीर तुच्छ है, क्षणभंगुर है। शारीरिक सुख क्षणिक है, अनित्य है। इसलिए ज्ञानीजन शरीर के प्रति ध्यान न देकर अंतरात्मा के प्रति सचेत रहने की बात करते हैं। आपने बताया कि अंतरात्मा की ओर ध्यान देने से प्राणी का जीवन सार्थक है। हमें ये जीवन भक्ति करके भगवान के पाने के लिए मिला है। संसार के पद प्राणी और पदार्थ सभी अनित्य हैं। परमात्मा और आत्मा ही नित्य तत्व है। उन्होंने कहा कि आत्मा के अभाव में शरीर तो शव मात्र है। हम शव होते ही अपना महत्व, व्यक्तित्व सब कुछ खो बैठते हैं। जिस प्रकार दीपक का महत्व ज्योति से है, उसी प्रकार आत्मा का महत्व शरीर से है, किंतु हम शरीर को सत्य मानकर मोह करते हैं यही इंसान की बड़ी भूल है। श्री गंगवाल ने बताया कि आर्यिका रत्न ने कहा कि परमात्मा का ज्ञान जीव को स्वयं नहीं होता इसके लिए जीवन में सत्गुरु की आवश्यकता होती है। जीव और परमात्मा के बीच में गुरु ही एक ऐसी कड़ी है जो जीव को परमात्मा बनाने का काम करती है। गुरु ही शिष्य को भगवान से मिलाते है। मात्र गुरु ही जीव को परमात्मा के साथ जोड़कर परमात्मा के स्वरूप का बोध कराकर फिर सबमें परमात्मा का ही दर्शन कराते हैं। इसलिए गुरु की शरण में जाकर परमात्मा की तलाश करो, निश्चित सफलता मिलेगी। 

               आज होगा विधान का समापन निकलेगी भव्य शोभायात्रा

संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के परम आशीर्वाद एवं आर्यिका श्री 105 अपूर्वमति माताजी,आर्यिका श्री अनुत्तरमति माताजी एवं आर्यिका श्री अगाधमति माताजी के परम आशीर्वाद एवं सान्निध्य में एवं कुशल प्रतिष्ठाचार्य बालब्रह्मचारी मनोज (लल्लन) भैय्या के निर्देशन में श्री 1008 पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर मैना में श्री 1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान एवं विश्वशांति महायज्ञ का आयोजन किया गया है ,जिसके समापन दिवस 4 जनवरी शनिवार को दोपहर 1बजे मैना मंदिर परिसर से भव्य श्रीजी की शोभायात्रा निकाली जाएगी। जिसमें आपकी उपस्थिति  समाज को गौरांवित करेगी।

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