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आष्टा : भगवान बनने के लिए व्यक्ति रोना तो दूर आंसू तक नहीं बहाता,वासना पर नियंत्रण करना ही मानव होने का संकेत है – अपूर्व मति माताजी

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भगवान बनने के लिए व्यक्ति रोना तो दूर आंसू तक नहीं बहाता,वासना पर नियंत्रण करना ही मानव होने का संकेत है – अपूर्व मति माताजी

आष्टा। आज के समय में व्यक्ति जमीन,जायदाद ,संपत्ति ,परिवार आदि के लिए रोते- बिलखते हुए देखे जा सकते हैं ,लेकिन किसी भी व्यक्ति को भगवान बनने के लिए रोना तो दूर आंसू तक नहीं आते हैं। मन को मित्र बनाकर अरिहंत प्रभु को अपना बना सकते हैं ।जैन दर्शन में इंद्रियों को जीतने अर्थात बस में करने वाले को जिनेंद्र कहते हैं ।भोजन मांगने वाले की समाधि नहीं होती है। वासना पर नियंत्रण करना ही मानव होने का संकेत है।

                           उक्त बातें श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर पर विराजित संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर महाराज की परम प्रभाविका शिष्या आर्यिका रत्न अपूर्वमति  माताजी ने कहीं ।दिगंबर जैन समाज के प्रवक्ता नरेंद्र गंगवाल ने उक्त जानकारी देते हुए बताया कि माताजी ने आशीर्वचन के दौरान आगे कहा कि जैन दर्शन में इंद्रियों को जीतने अर्थात बस में करने वाले को जिनेंद्र कहते हैं ।भोजन मांगने वाले की समाधि नहीं होती है ।अनादि काल से भोजन करते आए हैं, फिर भी भूख व मन शांत नहीं हो रहे हैं ।समाधि के समय मन व इंद्रियां काम आती है ।इंद्रियों का दुरुपयोग न करें ।जिन घरों में मुनियों का आहार नहीं होता है, वह घर श्मशान के समान है ।मनुष्य पर्याय का सही उपयोग करें। मन मेला हो जाए तो स्वाध्याय के माध्यम से साफ कर लो ,तन से दुखी हो तो मुनियों की सेवा कर लो, वह मन से दुखी हो तो स्वाध्याय कर लो, मन से दुखी है तो दान कर ले। चारों प्रकार के दान में से कोई भी एक दान अवश्य करें। देवपूजा, संयम, तप ,त्याग और दान नित्य करें ।भाग्यहीनों को ही रत्न की प्राप्ति नहीं होती।और रत्नात्रय अर्थात मुनि भाग्यशाली ही लोग बनते हैं। द्रव्य पूजा अवश्य करें ,भले ही भोजन कम मिले ।देवपूजा में अच्छा वाला चावल व द्रव्य चढ़ाएं। ज्ञान ,दर्शन आत्मा का धर्म है । देह के राग में आत्मा को ना भूलें ।वृत्ति के व्रत नियमों के कारण ही पालन होता है ।लोकितता से जितना दूर उतना ही मोक्ष मार्ग समीप होता है ।जिनवाणी से वात्सल्य मिलता है ।धर्मात्माओं के प्रति वात्सल्य का भाव रहता है। स्नेह का नहीं ।अरिहंत व गुरु से जुडने की बात आपने कही। समाज के प्रवक्ता श्री गंगवाल ने बताया कि माताजी ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि आज का युवा भारतीय संस्कृति, संस्कारों, नैतिक शिक्षा से भटक चुका है। जिस कारण से समाज में दूषित वातावरण पैदा हो रहा है, नशा विनाश का कारण बन रहा है और नशे के कारण परिवार बिखर रहे हैं। इसलिए प्रत्येक भारतवासी को अपने परिवार समाज में सबसे पहले बच्चों को भारतीय संस्कृति संस्कारों की प्रथम पाठशाला से परिचित कराना होगा। तभी हमारी संस्कृति और संस्कार बचेंगे। उन्होंने कहा कि व्यक्ति में रसना शाकाहारी और संयम से होना चाहिए। साथ में कामवासना से व्यक्तियों को बचना चाहिए। बुरे और समाज विरोधी लोगों से बचना चाहिएl 

                              उन्होंने कहा कि परिवारों में जिस प्रकार बेटियों का सम्मान करते हैं। उसी प्रकार से बहूओं का भी सम्मान होना जरूरी है। बिना दहेज की शादी करने वाले परिवारों को समाज में उचित स्थान देकर सम्मानित करना चाहिए। इससे परिवार में सुधार होगा। दहेज दानव को मिटाने के लिए आज के युवाओं को आगे आने के लिए माता पिता और परिवार के लोगों को शिक्षा संस्कारों से सुसज्जित बेटियों को बहू बनाने के लिए प्रेरित करना चाहिए। 

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