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आष्टा : जीभ जन्म से लेकर मरण तक साथ रहती है वैराग्य धारण करने वाले का जीवन सरलता के साथ व्यतीत होता है,निजी ज्ञान से व्यक्ति भटकता है और शास्त्र के ज्ञान से तर जाता है -अपूर्वमति माताजी

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जीभ जन्म से लेकर मरण तक साथ रहती है वैराग्य धारण करने वाले का जीवन सरलता के साथ व्यतीत होता है,निजी ज्ञान से व्यक्ति भटकता है और शास्त्र के ज्ञान से तर जाता है -अपूर्वमति माताजी 

आष्टा ।आत्मा का गुण धर्म जानना और देखना है ,पुदगल का धर्म बनना और बिगड़ना है। ज्ञान और दर्शन में कोई परिवर्तन नहीं है। प्रत्येक जीव की मौत आएगी, यह निश्चित है ।कोई हंसकर ,तो कोई रो कर मौत का सामना करते हैं ।आयु कर्म को कोई नहीं बचा सकता है। सम्यक दृष्टि व मुनिजन हंसते-हंसते अपने प्राण त्यागते हैं ।जबकि सांसारिक व्यक्ति रो-रो कर अपने प्राण छोड़ता है। दांत बाद में आते हैं, लेकिन जल्दी चले जाते हैं ।क्योंकि वह कठोर है। जीभ जन्म से लेकर मरण तक साथ रहती है। कठोर जीवन जीने वाला जल्दी चला जाता है, वैराग्य धारण करने वाला सरलता के साथ अपना जीवन व्यतीत करता है, उसे ज्ञान भी प्राप्त होता है ।

                    उक्त बातें श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर पर अपने आशीष वचन के दौरान संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर महाराज की परम प्रभाविका शिष्या आर्यिका रत्न अपूर्वमति माताजी ने कही।श्री दिगंबर जैन समाज के प्रवक्ता नरेंद्र गंगवाल ने प्रवचन की जानकारी देते हुए बताया कि आर्यिका रत्न अपूर्वमति माताजी ने आगे कहा कि सूर्य की 3 गति होती है, जब सुबह के समय सूर्योदय होता है तो वह बाल्यकाल होता है ,दोपहर में जवानी का और सायं काल में जब ढलता है तो वह वृद्ध अवस्था का प्रतीक होता है। इसी तरह मनुष्य भव भी ढल जाता है। संपत्ति, वैभव ,धन सभी यही रखे रह जाते हैं ।सूर्य के समान आयु कर्म कम होता है ।श्री गंगवाल ने प्रवचन की जानकारी देते हुए आगे बताया कि पक्षी दिनभर भले ही कहीं पर भी कितनी ही दूरी पर चले जाएं ,लेकिन शाम को वह अपने स्थान अर्थात घोंसले पर या वृक्ष पर अवश्य पहुंच जाते हैं। व्यक्ति धन ,संपत्ति ,वैभव जोड़ने में लगा रहता है ,लेकिन साथ में उसके यह कुछ नहीं जाता ।सब यहीं रखा रह जाता है ।कठोर जीवन जीने वाला व्यक्ति का मरण जल्दी होता है ।संसार की रफ्तार बहुत तेज है उससे कम रफ्तार से चलोगे तो सही जीवन व्यतीत होगा । अपूर्वमति माताजी ने कहा कि सम्यक दृष्टि, ज्ञानी और बैरागी दौड़ते नहीं थमने का प्रयास करते हैं। वैराग्य के कारण रुकते हैं निजी ज्ञान से व्यक्ति भटकता है जबकि शास्त्र के ज्ञान से भटकता नहीं है स्वाध्याय हमारे लिए मील का पत्थर है ।सेनापति का समर भूमि में भाषण नहीं संघपति का सिर्फ संकेत चलते हैं ।इसी प्रकार गुरु का भी संकेत शिष्यों के लिए काफी है। अपूर्वमति माताजी ने कहा कि गुरु मोक्षमार्ग, संयम का मार्ग बताते हैं ।समोशरण में भी युद्ध नहीं ,भगवान की देशना सुनने को मिलती है ।समोसारण की भूमि मिले यह भावना भाना चाहिए। हृदय में धर्म का बीज होगा, अगर हृदय कोमल होगा । हृदय को क्रोध से लाल न करें ।मोक्ष व संयम का फल लगेगा और जीवन सार्थक होगा ।भगवान की वाणी औंकारमय है जो सभी को तार देती है ।भगवान की वाणी को गणधर झेल कर 700 भाषाओं में पहुंचाते हैं ।धर्म का धन कोई नहीं चुरा सकता। आज वर्तमान में इतनी ईमानदारी नहीं है , जो पहले के जमाने में हुआ करती थी। भोग को छोड़कर संयोग में जाओ, वियोग में नहीं। देव, शास्त्र, गुरु का सहयोग मिलता रहे तो तप, संयम, चारित्र की प्राप्ति होगी।

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