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आष्टा : आचरण में तिल मात्र भी दोष न हो ,वही आचार्य बनते हैं ,आचार्यश्री कठोर नहीं विनम्रता से बोलते हैं , आचार्य श्री जादूगर के समान हैं-आर्यिका अपूर्वमति माताजी

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आष्टा। हमेशा त्याग, तप ,साधना में दिगंबर जैन संत दिखते हैं….. । आचरण में तिल मात्र भी दोष न हो ,वह आचार्य बनते हैं। आचार्यश्री जब चलते हैं तो चार हाथ जमीन को देख कर चलते हैं। आचार्यश्री के प्रथम दर्शन मात्र से मुझे सम्यक दर्शन का मार्ग मिला। आचार्यश्री गुरु आज्ञा का पालन कर रहे हैं। 21वीं सदी में सभी आचार्य बनना चाहते हैं ,लेकिन यह संभव नहीं है। आचार्यश्री एक ऐसे जादूगर हैं ,जिनकी आंखों में सभी समाया हुआ है। वह इतने बड़े संघ को लेकर चलने वाले संघ नायक , लोकनायक तथा चर्या नायक भी है।

                               उक्त बातें संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर महाराज के 47 वें आचार्य पदारोहण दिवस के पावन अवसर पर श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर पर आर्यिका रत्न अपूर्वमति माताजी ने कहीं । समाज के प्रवक्ता नरेंद्र गंगवाल ने उक्त जानकारी देते हुए बताया कि आर्यिका रत्न ने आशीर्वचन के दौरान कहा कि आचार्यश्री ने अपने गुरु ज्ञान सागर महाराज से दीक्षा ली थी और उन्होंने अपने अंतिम समय में विद्यासागर महाराज को आचार्य पदवी देना चाही, लेकिन विद्यासागर जी तैयार नहीं थे ,तो उन्होंने कहा कि मुझे गुरु दक्षिणा चाहिए और गुरु दक्षिणा में उन्होंने कहा कि जो मैं कहूंगा वह मानना है ।इस तरह आचार्यश्री को यथा नाम, यथा गुण वाले ज्ञान सागर महाराज गुरु ने आचार्यश्री की पदवी देकर सल्लेखना ली, विद्यासागर जी ने अपने ज्ञान सागर जी की कॉफी वैय्या वृति की ।अपूर्वमति माताजी ने आगे बताया कि आचार्यश्री अपने हाथों से ही परिमार्जन कर कमंडल और पिच्छी स्वयं लेकर चलते हैं ।ना तो स्वयं चर्या में समझौता करते हैं और ना ही अपने शिष्यों को ऐसी कोई गलत प्रेरणा देते हैं। किसी भी वस्तु से राग मत करो यह प्रेरणा आचार्यश्री हम सभी को देते हैं। चातुर्मास कहां करना है, यह आज्ञा आचार्यश्री देते हैं ।सुविधा के लिए नहीं धर्म, ध्यान एवं प्रभु की वाणी जन -जन तक पहुंचाने के लिए प्रेरणा देते हैं। इस अवसर पर अनुत्तरमति माताजी एवं अगाध मति माताजी ने अपने आशीर्वचन में कहा कि आचार्य पदवी के लिए कौन-कौन से गुण होना चाहिए, आचार्य क्यों बनते हैं, हर कोई आचार्य के पद पर आसीन नहीं हो सकता है ।जिस प्रकार किसी भी देश को व्यवस्थित संचालित करने के लिए संविधान होता है ।उसी प्रकार आचार्यश्री बनने के लिए नियम व संविधान का पालन करना पड़ता हैं। श्री गंगवाल ने आगे बताया कि अनुत्तर मति माताजी ने अपने प्रवचन के दौरान कहा आचार्यश्री के गुण का जितना बखान करो ,उतना कम है। आज कल मोह के कारण गुरु शिष्य बना लेते हैं और शिष्य गुरु बना लेते हैं ।जबकि बिना जांचे ,परखे गुरु नहीं बनाना चाहिए और ना ही गुरु शिष्य बनाएं ।अनुत्तर मति माताजी ने आगे कहा कि आचार्य शांतिसागर महाराज का एक ग्रंथ इस आष्टा के मंदिर में मिला है। जो 1955 में लिखा गया था ,जिसमें क्षुल्लक अवस्था में शांति सागर महाराज हैं ।आचार्य श्री ने अपने गुरु से कहा था कि मुझे विनाशी नहीं अविनाशी पद दे देवे ।उन्होंने विवेक सागर महाराज को आचार्य पद देने के लिए अपने गुरु से विनती की थी ,लेकिन गुरु ने अपना उत्तराधिकारी आचार्य विद्यासागर महाराज को बनाया और स्वयं मुनि बनकर विद्यासागर महाराज के चरण स्पर्श किए और तीन बार नमोस्तु बोला ।इस प्रकार एक गुरु अंतिम समय में अपने ही शिष्य को गुरु बना कर सब कुछ त्याग कर अपने जीवन को सार्थक करते हुए सल्लेखना ले लेते हैं और यही शांतिसागर महाराज ने किया था ।

आचार्य बनने वाले मुनि बुद्धिमान ,समस्त शास्त्रों का ज्ञाता, लोक व्यवहार की उत्तम नीति को जानने वाले, उसे देखकर जानने वाले, संसार से दूर होने वाले , द्रव्य ,क्षेत्र काल के शुभ अशुभ को जानने वाले, दूसरे के मन को हरण करने वाले, पर निंदा ना करें गुणों की खान हो ,मधुर वाणी हो उन्हें आचार्य परमेष्ठी का पद दिया जाता है ।क्षमा सागर महाराज के सांसारिक जीवन में जब वह इंजीनियर थे उस दौरान औकारेश्वर का पुल बनवाया था। आचार्य श्री लोकिक शिक्षा के स्थान पर परलोकिक शिक्षा दिलाते हैं ।आज व्यक्ति के पास धन है ,लेकिन समय नहीं है। गौशालाओं के लिए आचार्यश्री ने प्रेरणा दी और आज पूरे देश में अनेकों व्यवस्थित गौशाला संचालित हो रही है ।समाज के लिए आचार्यश्री चिंता करते हैं ।आचार्यश्री के लक्षण जानो ,नियम किससे लेना, यह भी समझे। जिन शासन की रक्षा कैसे होगी अगर आचार्य पद बिकने लगेगा तो क्या स्थिति होगी। आचार्य ज्ञानसागर महाराज को एक शिल्पकार बताते हुए अनुत्तरमति माताजी ने कहा कि उन्होंने आचार्य विद्यासागर महाराज का चयन कर समाज, देश एवं विश्व को एक बहुत बड़ी सौगात दी है ।लोग आज अपने पाप घोना चाहते हैं, लेकिन पाप जैसा वह समझते हैं उससे नहीं घुलते हैं। हम प्रेषित के लिए आचार्य श्री से अनेकों बार विनती करते हैं लेकिन हमें आसानी से प्रायश्चित नहीं मिलता है सब तो अग्नि रह गए और आप अंबर हो गए मेरी तपस्या के जिनालय वासी वाला भी आप ही हैं दिन-रात विद्यासागर विद्यासागर गुनगुनाती हूं गुरु जी के साथ से पढ़ो और उस पर अमल करो आरिका अगाध मति माताजी ने कहा कि आचार्य ज्ञानसागर महाराज ने विद्यासागर महाराज के द्वारा आचार्य पदवी स्वीकार नहीं करने पर गुरु दक्षिणा में आचार्य पद लेने को कहा और विद्यासागर जी ने ना चाहते हुए भी गुरु के आदेश का पालन का आचार्य का पद लिया था आचार्य पद के संस्कार उनको ज्ञान सागर महाराज ने दिए थे और जब भी किसी को आचार्य पद की पदवी दी जाती है तो उन्हें नई पीछे सौंपी जाती है और यह पीछे ज्ञान सागर महाराज ने उन्हें सौंपी थी जैन संतों में एक समय ऐसा आता है जब गुरु शिष्य बन जाता है और शिशु बन जाता है और वह स्थिति आचार्य ज्ञानसागर महाराज के दौरान हुई थी आचार्य श्री आज भी सिंहासन पर पूरे टिक कर नहीं बैठते हैं वह अपने गुरु के लिए जगह रखते हैं शांतिसागर महाराज को सल्लेखना दिलाने के पहले काफी भैया वृद्धि भी आचार्य विद्यासागर महाराज ने की थी कैसे बने विद्यासागर हमें भी बता दो इस कविता पाठ को शानदार तरीके से अगर मति माताजी ने उपस्थित जन के समक्ष प्रस्तुत की घर घर में हो पाठशाला यह संदेश देते हुए पाठशाला के बच्चों ने शानदार प्रस्तुति दी ।वहीं पाठशाला के बच्चों ने विद्यासागर जी के दीक्षा व आचार्य पद की भी प्रस्तुति देकर सभी को मंत्रमुग्ध किया।आचार्यश्री के 47 वें आचार्य पदारोहण दिवस पर आचार्य छत्तीसी महामंडल विधान लाभार्थी परिवारों द्वारा एवं समाज जन द्वारा भक्ति भाव के साथ अपूर्वमति माताजी के ससंघ सानिध्य में एवं इंदौर से पधारे ब्रह्मचारी पारस भैय्या के मार्गदर्शन में सानंद संपन्न हुआ।

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